आसोप की इन छतरियों में झलकती है मुगलकाल की विरासत लेकिन लेकिन आज उपेक्षा के दंश के चलते दुर्दशा का शिकार हो रही हैं।|

Posted on 04/05/2016

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कस्बे का प्राचीन नौसर तालाब आस्था और आकर्षण का केन्द्र रहा है। इसके पानी में हिलोर मारती लहरें और इसके आसपास फैले धोरे इसे रमणीय स्थलों में अग्रणी बनाते आए हैं। ग्रामीण जनजीवन इस तालाब से अपनी संस्कृति और अपनी रीतियों को सींचता आया है। धार्मिक हो या कोई अन्य आयोजन यह तालाब ग्रामीणों की जिंदगियों में खास स्थान रखता आया है।

इस नौसर तालाब की पाल पर स्थित हैं एेसी एेतिहासिक छतरियां जिनका आकर्षण राह चलते पथिकों को भी एकबारगी रोककर उन्हें निहारने को मजबूर कर दे। सैकड़ों वर्ष पुरानी ये छतरियां अपने में गौरवशाली इतिहास और अनकहे दास्तानों को अपने में समेटे हुए है। इन छतरियों में मुगलकाल से लेकर देश की आजादी तक फैले राजा-महाराजाओं के इतिहास की झलक देखने को मिलती है।

स्थापत्य कला का उत्कृष्ट नमूना
ये छतरियां स्थापत्य कला का उत्कृष्ट नमूना मानी जाती रही हैं। जानकारों का कहना है कि बारीकी से पत्थरों को तराशकर इनका निर्माण किया गया है। इनकी नक्काशी इतनी बारीक व बेजोड़ है कि इसे देखने वाले इसकी सुंदरता को देखकर मुग्ध हो जाते हैं। पत्थरों पर की गई बारीक गढ़ाई, बेल-बूटों के चित्र, छज्जों का आकार, चारों ओर लगाई गई रेलिंग, तराशे गए स्तम्भ और छत पर लगे पत्थरों पर उकेरी गईं आकृतियां समय के हाथों में सौंपी गई अमूल्य थाती हैं।

इनकी खूबसूरती इन्हें निहारने वालों का मन मोह लेती हैं। छतरियों के नीचे बने चबूतरों पर संगमरमर पत्थर के बने शिलालेख खुदे हुए हैं। इन शिलालेखों पर संबंधित तत्कालीन महाराजाओं के इतिहास की जानकारियां मिलती हैं।

आस्था का अनूठा केन्द्र
ये छतरियां केवल इतिहास की सूचक या दर्शकों के आकर्षण का केन्द्र ही नहीं हैं। इन सब बातों के अलावा भी ग्रामीण जनमानस में इनका विशेष महत्व है। इन छतारियों में से एक छतरी के प्रति श्रद्धालुओं में खासी आस्था है। प्राचीन तालाब के घाट पर स्थित इस छतरी के नीचे गुफा में रामस्नेही संप्रदाय की खेड़ापा पीठ के आदि आचार्य रामदास महाराज ने 1817 से 1820 तक साधना की थी।

माना जाता है कि इस स्थान पर समाधिस्थ होकर रामदास महाराज ने ब्रह्मज्ञान की प्राप्ति की थी। इस बात का उल्लेख उनकी कही वाणी में जानने को मिलता है। उन्होंने अपनी अनुभवी वाणी की रचना का एक हिस्सा यहां बैठ कर पूरा किया था।

रामदास बीसौ बरस, ता में काती मास,

वा दिन छाड़ी त्रृगटीए किया ब्रह्म बास।

उपेक्षा का दंश झेल रहीं छतरियां
लंबे समय तक आस्था और कला का बेजोड़ नमूना रहीं ये छतरियां आज उपेक्षा के दंश के चलते दुर्दशा का शिकार हो रही हैं। राजतंत्र की समाप्ति के बाद सत्ता का रुख बदलने से इनकी देखभाल भी अब नहीं के बराबर होने लगी है।

पर्याप्त देखरेख के अभाव में अब ये एेतिहासिक छतरियां जीर्ण-शीर्ण होती जा रही हैं। जर्जर हो चुकी इन छतरियों के छज्जे व अन्य भाग हर पल हादसे को न्यौता दे रहे हैं। लोगों का कहना है कि यदि इनका उचित रखरखाव नहीं रखा गया तो वो दिन दूर नहीं रहेगा जब ये खुद इतिहास का हिस्सा बन जाएगी।

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