गुमनामी के अंधेरे में छुपा जोधपुर की आजादी का स्तंभ||

Posted on 14/04/2016

jodhpur ke aazadi ka stambh

जोधपुर के एेतिहासिक दुर्ग को मुगलों से फतह करने के उपलक्ष्य में 308 साल पहले निर्मित महत्वपूर्ण कीर्ति स्तंभ आज पूरी तरह गुमनामी के अंधेरे में है। सूरसागर क्षेत्र के राजाराम मेघवाल सर्किल से सूरसागर थाना रोड पर स्थित निजी स्वामित्व के अधीन खेत में खंडित चबूतरे पर कलात्मक कीर्ति स्तंभ धूल फांक रहा है।

विक्रम संवत 1765 में श्रावण सुदी तेरस (19 जुलाई 1708) को तत्कालीन महाराजा अजीतसिंह ने जोधपुर के फौजदार मेहराब खां को पराजित कर मेहरानगढ़ दुर्ग पर विजय प्राप्त करने के उपलक्ष्य में कीर्ति स्तंभ का निर्माण करवाया था। लंबे अर्से बाद जोधपुर को पुन: आजादी मिलने की स्मृति में बने कीर्ति स्तंभ पर राव जोधा से लेकर महाराजा अजीतसिंह की यथावत वंशावली उत्कीर्ण है।

संस्कृत भाषा में लिखे जोधपुर शासकों के दस पीढि़यों के नामों के साथ अलंकार व उपमाएं भी हैं, जो उनके शौर्य और वीरता का परिचय देती हैं। कीर्ति स्तंभ के पास ही तुलादान का चबूतरा है।

कीर्ति स्तंभ पर संस्कृत भाषा में लिखा सार

कीर्ति स्तंभ पर उत्कीर्ण लेख में अजीतसिंह को यवनों के अंधकार को दूर करने वाला सूर्य तथा भोगिशैल पर्वत की तरह महापवित्र दुर्ग सुभटपुर को जीतने वाला बताया है। इतिहासविदों के अनुसार स्तंभ पर भोगिशैल का सुभदपुर दुर्ग जोधपुर दुर्ग की ओर संकेत है।

इस विजय के उपलक्ष्य में पांच माह बाद महाराजा अजीतसिंह के समय यह कीर्ति स्तंभ सूरसागर में स्थापित किया गया था। स्तंभ में कुल 79 पंक्तियां हैं, जिनकी पिछली पंक्तियां नष्ट हो चुकी हैं।

कीर्ति स्तंभ के पास तुलादान का चबूतरा

कीर्ति स्तंभ के पास तुलादान का चबूतरा है। चबूतरे का निर्माण महाराजा जसवंत सिंह की प्रथम रानी देवड़ी अतिसुखदे (सिरोही के राजा अखेराज की पुत्री) ने करवाया था। अजीतसिंह के जोधपुर पर विजय हासिल करने के बाद विक्रम संवत 1707 में सूरसागर महलों में रही। विक्रम संवत 1708 में पौष सुदी सप्तमी को देवड़ी ने तुलादान कर 108 गायें और 5700 रुपए तुलादान किए।

जोधपुर राज्य की दस्तूर बही के अनुसार महाराजा अजीतसिंह विक्रम संवत 1770 में भादवा सुदी अष्टमी को रानी, पुत्र, पुत्री सहित तुलादान किया। मारवाड़ की ख्यात के अनुसार सवाईराजा सूरसिंह व महाराज कुमार गजसिंह (प्रथम) ने चांदी के फिरोजी सिक्के से तुलादान किया था।

अब निजी खातेदारी में

राठौड़ राजवंश का महत्वपूर्ण एेतिहासिक कीर्ति स्तंभ व तुलादान चबूतरा वर्तमान में घासीराम पुत्र प्रतापसिंह सोलंकी व उनके परिवार के निजी 28 बीघा खेत के बीच में स्थित है। सोलंकी परिवार के बालकिशन ने पत्रिका से बातचीत में बताया कि पूर्व राजपरिवार से जुड़े लोग कीर्ति स्तंभ को लेकर सम्पर्क कर चुके हैं।

मारवाड़ के महत्वपूर्ण स्मारक का संरक्षण हो

मारवाड़ का महत्वपूर्ण स्मारक होने के कारण कीर्ति स्तंभ का संरक्षण होना चाहिए। स्टेट गजट नोटिफिकेशन 1926 की एएसआई रिपोर्ट में भी कीर्ति स्तंभ व चबूतरे को संरक्षित स्मारक घोषित किया गया था। इंटेक भी चाहता है स्मारक संरक्षित रहे। जोधपुर के राठौड़ राजवंश व संस्कृत पर शोध करने वाले देश विदेश के शोधार्थियों के लिए स्तंभ लेख महत्वपूर्ण साबित हो सकता है।

एमएस तंवर, इंटेक सदस्य व सहायक प्रबंधक मेहरानगढ़ म्यूजियम ट्रस्ट जोधपुर।

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