जमीं में समा रही है करीब 900 साल पुरानी एक कहानी।

Posted on 03/04/2016

kiradu badmer

बाड़मेर धोरों में करीब 25 फीट की मूर्ति ही नहीं दब रही, बल्कि एक पूरा इतिहास और रहस्यमयी शिल्प जमींदोज हो रहा है। इस पुरातत्व की न विभाग सार-संभाल कर रहा है और ना ही कोई दूसरा जिम्मेदार इसे संरक्षित करने की दिशा में कोई पहल।

वीरान रेगिस्तान में दब रहा यह बेजोड़ शिल्प बाड़मेर शहर से करीब 37 किलोमीटर दूर हाथमा गांव स्थित राजस्थान का खजूराहो कहे जाना वाले किराडू के मंदिरों से करीब आधा किलोमीटर दूर है। किराडू से बाहर जाते ही थोड़ी दूरी पर वीरान धोरों में दबा है किराडू का इतिहास। यहां जमीं में समा रही है करीब 900 साल पुरानी एक कहानी। इतने सालों में किराडू के रहस्य से तो पर्दा नहीं उठ पाया, तपते रेगिस्तान में यह और गहराता जरूर जा रहा है।

ग्रामीणों के अनुसार, जमींदोज हो रही यह मूर्ति करीब 25 फीट की है। हालांकि अब तो बमुश्किल 1-2 फीट ही बाहर नजर आती है। गांव के एक जानकार युवक राजपाल ने बताया कि अपने बच्चे को लेकर गधे पर सवार जा रही एक कुम्हारिन की यह मूर्ति है। गांव के 89 वर्षीय बुजुर्ग गोरखाराम इसके पीछे की कहानी सुनाते हैं। उन्होंने बताया, किराडू अपने समय में सुख-सुविधाओं से संपन्न विकसित प्रदेश था। दूसरे प्रदेशों के लोग यहां व्यपार करने आते थे।

लेकिन 12वीं शताब्दी में जब किराडू पर परमार वंश का राज था, यह वीरान हो गया। इस जगह पर एक साधु का श्राप लगा हुआ है। करीब 900 साल पहले यहां साधु धूंधलीमल रहने आए। यहां एक पहाड़ी पर 12 साल की तपस्या पर जा रहे थे तब उन्होंने गांव वालों से उनके एक शिष्य का ख्याल रखने को कहा। लेकिन ग्रामीणों ने उसका बिल्कुल ध्यान नहीं रखा। जीवन बचाने के लिए उसे संघर्ष करना पड़ा।

तभी एक कुम्हारिन ने उसे एक कुल्हाड़ी दी और कहा कि वह जंगल जाकर रोज लकडिय़ां काट अपना जीवनयापन करे। शिष्य ने ऐसा ही किया, लेकिन इस दौरान उसके सिर के बाल उड़ गए और वह बहुत कमजोर हो गया। आखिर थकहार शिष्य साधू के चरणों में गिर गया। शिष्य की दशा देख साधू क्रोधित हुए। बोले-जिस स्थान पर दयाभाव ही नहीं है, वहां मानवजाति को भी नहीं होना चाहिए। पाटन सब दातन, जूना सब सूना कहते हुए उन्होंने संपूर्ण नगरवासियों को पत्थर बन जाने का श्राप दे दिया।

जिस कुम्हारिन ने उसके शिष्य की मदद की, साधु ने उसे शाम होने से पहले यहां से चले जाने को कहा और यह भी सचेत किया कि पीछे मुड़कर न देखे, नहीं तो वह भी पत्थर की बन जाएगी। वह थोड़ी दूरी पर गई ही थी कि पीछे से लोगों के चिल्लाने और मकानों के गिरने के साथ शंखनाद की ध्वनि सुनाई दी। कुम्हारिन ने पीछे मुड़कर देखा तो वह उसी जगह पत्थर की बन गई। बस तभी से यह मूर्ति यहां स्थापित हो गई। यहां पहाड़ी पर आज भी बाबा धुंधलीमल का मंदिर है।

गांव के 70 वर्षीय बुजुर्ग चांदाराम बताते हैं कि कुछ सालों पहले यहां सेना के जवानों ने इस मूर्ति को धोरों से बाहर निकालने की कोशिश की। करीब 20 फीट मूर्ति बाहर आई, जो उन्होंने भी देखी। लेकिन वे इसको हिला तक नहीं सके। चांदाराम कहते हैं, मूर्ति में गधे पे सवार एक महिला का मुंह पीछे की तरफ है। जो प्रचलित दंत कथा से मेल भी करता है। ग्रामीण चाहते हैं कि मूर्ति पर से मिट्टी हटाकर यहां चारदीवारी बना देनी चाहिए। इसे इसी जगह संरक्षित कर पुरातत्व विभाग को सुरक्षाकर्मी तैनात करना चाहिए। किराडू और इस मूर्ति स्थल को पर्यटन की दृष्टि से विकसित करने की दरकार है।

Source :-rajasthanpatrika.patrika.com

 

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