जालोर जहा प्राचीन संस्कृत पाढ्शाला होती थी वो आज शिक्षा के क्षेत्र में सबसे पीछे

Posted on 01/01/2017

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जालोर नगर के मध्य में परमार राजा भोज के काल में निर्मित एक भव्य संस्कृत पाठशाला एवम् देवालय के हिस्से मौजूद है जो सदियाँ बीतने पर भी अपनी पूरी भव्यता को संजाये हैं। राजा भोज संस्कृत साहित्य का अधिकारी विद्वान् थे उन्होंने के प्रचार-प्रसार के लिये अनेक शालायें बनवाईं जिनमें भोज की राजधानी धार, अजमेर तथा जालोर में बनवाई गई तीनों पाठशालायें एक ही आकृति की हैं। आजकल धार की संस्कृत पाठशाला एवम् देवालय कमल मौला की मिस्जद के नाम से, अजमेर की पाठशाला एवम् देवालय ढाई दिन का झोंपडा के नाम से तथा जालोर की पाठशाला तोपखाना के नाम से जानी जाती है।

जालोर स्थित पाठशाला में पत्थरों पर अत्यन्त बारीक एवम् सुन्दर कारीगरी की गई है। दोनो ओर के पाश्र्वों में छोटे-छोटे देवालय बने हुए हैं जिनमें अब कोई प्रतिमा स्थापित नहीं है। प्रवेश द्वार के ठीक सामने मुख्य आहता बना हुआ है। जिसके विशाल स्तंभों पर छत टिकी हुई है। प्रत्येक स्तंभ अपनी बारीक कारीगरी से दर्शक को घंटों तक बान्धे रख सकता है। इन पर उत्कीर्ण फूल, घन्टे, जंजीरें, लता, हाथी तथा ज्यामितीय आकृतियां मध्यकालीन कला वैभव का मुंह बोलता उदाहरण है। मुख्य प्रांगण के दाहिने कोने में एक कक्ष भूमि से लगभग 10 फीट ऊपर बना है। जिस पर जाने के लिये सीढ़िया बनी हैं। यहां संभवत: आचार्य के बैठने की व्यवस्था थी जहां से वे बड़ी संख्या में उपस्थित विद्यार्थियों को एक साथ सम्बोधित कर सकते थे।

इस स्मारक में आज भी 276 खम्भे हैं जो कि इसकी समृद्धता का प्रतीक है। मुख्यद्वार से प्रवेश करते समय बाईं ओर को एक भग्न देवालय अलग से बना हुआ है जहां संभवत: शिवलिंग स्थापित था। अब यहां विभिन्न देव मूतियां खण्डित अवस्था में पड़ी हैं। जिनमें शिव-पार्वती, गणेश तथा वाराह अवतार की मूर्तियां हैं।‘शाला में स्थित दाहिनी ओर का पाश्र्व अधूरी कला से सज्जित है। ऐसा प्रतीत होता है कि इसका निर्माण कार्य निरन्तर चल रहा था किन्तु किसी कारणवश इसका निर्माण कार्य अधूरा छूट गया।लगभग यही स्थिति मुख्य मण्डप के बाहर की ओर स्थित `आर्च´ की है जो बनाते बनाते अचानक अधूरे छोड़ दिए गए हैं। राज्य सरकार की ओर से पिछले तीन सालों में तोपखाने के विकास के लिए लाखों रुपए खर्च किए जाकर इसे दर्शनीय बनाने का प्रयास किया जा रहा है। वर्तमान में केमिकल ट्रीटमेंट से तोपखाने का रूप निखारा जा रहा है।

मुख्य  दीवार पर प्रवेश करते समय  बाई ओर एक भग्न देवालय अलग से बना हुआ है जहा संभवत शिवलिंग स्थापित था | अब यहां विभिन देव मुर्तिया खंडित अवस्था में पड़ी है जिसमें विष्णु शिव पार्वती गणेश तथा वराह अवतार की मुर्तिया विशिष्टि है | शाला में स्थित दाहिना ओर का पार्श्व अधूरी कला से सज्जित है |ऐसा प्रतिक होता है की इसका निर्माण कार्य अधूरा छोड़ देना पड़ा | लगभग यही स्थति मुख्य मंडप के  बाहर की ओर स्थित ‘आर्च ‘ की है जो बनते बनते अचानक अधूरे छोड़ दिए गए |संभावता किसी मुस्लिम आक्रांता के आक्रमण के कारण |

इसके तीनो दीवारों में से उत्तर के दीवार पर फारसी लिपि में एक लेख खुद है जिसमें सुल्तान मोहमंद बिन तुगलक का नाम है |

आज वही जालोर शिक्षा के क्षेत्र में सबसे पिछड़ा हुआ है कौन है इसका ज़िमेदार |

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