नृत्य युद्ध शैली का अनूठा संगम “गैर नृत्य” : जालोर जिला पूरे भारत में पहचान रखता है

Posted on 28/02/2016

Gair dance rajasthan

गोले घेरे में इस  नृत्य की संरचना होने के कारण यह “घेर ” और कालांतर में ” गैर ” कहा जाने लगा है | नृत्य करने वालो को गैरिया कहते है |मेवाड़ और मारवाड़ में इस नृत्य की धूम मची रहती है |   इस नृत्य को देखने से ऐसा लगता है मानो तलवारो से युद्ध चल रहा हो  |   इस नृत्य की सारी प्रतिक्रिया और पद संचालन तलवार युद्ध और पटेबाजी जैसा लगती है | यह नृत्य वृत में होता है और नृत्य करते करते मंडल बनाया जाते है |  मेवाड़ और बाड़मेर के गैर नृत्य की मूल रचना एक ही प्रकार है किन्तु नृत्य की लय ,चाल और मंडल मे अंतर है | नर्तक सफ़ेद धोती , सफ़ेद अंगरखी तथा सर पर लाल अथवा केसरिया रंग की पगड़ी बांधते है |

जालोर क्षेत्र में नर्तक फ्रॉक जैसी आकृति का एक घेरदार लबादा पहनते है तथा कमर में तलवार बंधने के लिए पट्टा भी धारण करते है |

गैर नृत्य तीन प्रकार के होते है
आगे बागे की गैर : इये आंगी की गैर भी कहते है इसमें नर्तक चालीस मीटर के कपडे से बनी आंगी व बागा पहनता है | कपडे का रंग सफ़ेद और लाल होता है | नर्तक दोनों हाथों में रोहिड़े या बबूल की डांडिया लिए हुए ढोल पर घूमते हुए अपनी डांडिया आजू-बाजू के नर्तक की डंडियों से ठहराते है|

नागी गैर – इससे साधी गैर भी कहते है यह दो प्रकार की होती है डांडियों वाली गैर और रुमाल वाली गैर |

स्वांगी गैर :- इसमें अलग अलग नर्तक वैश में माली ,सरदार ,साधु आदि रूप धारण करते है |

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